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palitana 5 chaityavandan in hindi full
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Palitana 5 Chaityavandan In Hindi New! Full [Plus SOLUTION]

3. रायण पगला चैत्यवंदन (तीसरा पड़ाव)

'चैत्यवंदन' शब्द दो भागों से मिलकर बना है: और वंदन । चैत्य का अर्थ है जिन मंदिर या मूर्ति, और वंदन का अर्थ है प्रणाम करना या स्तुति करना। अतः चैत्यवंदन का तात्पर्य जिन मंदिरों और मूर्तियों की विधिपूर्वक वंदना करना है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, चैत्यवंदन करने से आत्मा में शुभ भावों का उदय होता है, जिससे कर्मों का क्षय होता है और अंततः कल्याण की प्राप्ति होती है। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें मन से ध्यान, वचन से स्तुति और काया से पूजा शामिल है। यह विधि जैन धर्म के श्वेतांबर संप्रदाय में विशेष रूप से प्रचलित है।

"सकलकुशलवल्ली पुष्करावर्त-मेघो। दुरित तिमिर भानुः कल्पवृक्षोपमानः। भवजलनिधिपोतः सर्वसंपत्ति-हेतुः। स भवतु सततं वः श्रेयसे शांतिनाथः॥"

पुंडरीक गंधार (भगवान आदिनाथ के मुख्य गणधर) ने श्री आदिनाथ जिनेंद्र से भव्य जनों (आत्माओं) को तारने का उपाय पूछा। हे भगवान! आप हमें परमानंद (मोक्ष) प्रदान करें। सिद्धगिरी के स्वामी, हमें सुरलोक का सुख दें। जिनेंद्र देव के चरणों की वंदना से भव-भव के दुख नष्ट हो जाते हैं।

यह 'प्रवेश द्वार' है जहाँ हम पर्वतराज को वंदन कर अपनी यात्रा सफल बनाने की प्रार्थना करते हैं। स्तवन: palitana 5 chaityavandan in hindi full

: तीर्थंकर भगवंतों की स्तुति।

यह स्थान उस रायण वृक्ष के नीचे है जहाँ आदिनाथ प्रभु के चरण पादुका प्रतिष्ठित हैं। माना जाता है कि आदिनाथ प्रभु यहाँ 99 बार पधारे थे। Tattva Gyan हिंदी सार:

नीचे पालिताना के मुख्य शिखरों और देवस्थानों पर किए जाने वाले पाँचों चैत्यवंदन का संपूर्ण पाठ और विधि दी गई है।

इस मंत्र के माध्यम से भक्त शत्रुंजय क्षेत्र की महिमा का गुणगान करते हैं और यहाँ सिद्ध हुए अनंत आत्माओं को नमन करते हैं। जेणे पाम्या केवलज्ञान

रायण पगला चैत्यवंदन (Rayan Pagla)

प्रस्तुत लेख में पालीताणा के पाँच चैत्यवंदन की संपूर्ण जानकारी, उनके मंत्र और विधि को विस्तार से प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। जैन धर्म के अनुयायियों के लिए यह जानकारी अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी। इस लेख को साझा करें ताकि अधिक से अधिक लोग इस पवित्र विधि से परिचित हो सकें और लाभान्वित हो सकें।

पंचांग (नमस्कार) और पंचकल्याणक (गर्भ, जन्म, दीक्षा, ज्ञान, मोक्ष) जिनवर के निर्विकार गुणों को दर्शाते हैं। उनके तप कल्याणक (दीक्षा कल्याणक) की महिमा अपरम्पार है। मैं अपनी आंखों से भगवान की प्रतिमा को देखकर उनके चरण कमलों की पूजा करता हूँ। शत्रुंजय के स्वामी! मेरे जन्म-जन्मांतर के दुखों का नाश कीजिए।

"पुंडरीक स्वामी वंदिए, जेणे पाम्या केवलज्ञान; शत्रुंजय गिरिराज ना, प्रथम गणधर महान।" शत्रुंजय गिरिराज ना

चौथा और मुख्य चैत्यवंदन पालीताना के भव्य मूलनायक दादा आदिनाथ के मुख्य दरबार में गर्भगृह के सम्मुख किया जाता है। संपूर्ण पाठ:

जय शत्रुंजय सिद्धक्षेत्र, दीठे दुर्गति वारे।भाव धरी ने जे चढे, तेने भव पार उतारे।अनंत सिद्धानो अहे ठाम, सकल तीर्थनो राय।पूर्व नवनू ऋषभदेव, ज्यां ठाव्या प्रभु पाय।सूरजकुंड सोहामनो, कवड्याक्ष अभिराम।नाभिराया कुल मंडनो, जिनवर करूँ प्रणाम।

यात्रा के बारे में भी जानना चाहेंगे?

एकाग्र चित्त होकर ऊपर दिए गए विशिष्ट स्थान का पढ़ें।

यह पहला चैत्यवंदन पालीताणा की पहाड़ी के आधार पर स्थित '' नामक स्थान पर किया जाता है। इस स्थान को पवित्र यात्रा का प्रारंभिक बिंदु माना जाता है। इस चैत्यवंदन का मंत्र इस प्रकार है:

भावपूर्वक की गई वंदना संचित कर्मों को तेजी से नष्ट करती है।